संदेश

प्रज्ञा आई

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चढ़ा घोड़े पे अंकित और बजी शहनाई ,पहन कर चुनरी हौले से प्रज्ञा आई ; मुदित हुए सब घर में रोशनी सी छाई ,पड़े शुभ कदम घर में लक्ष्मी आई ; है सबका आशीष खुश रहें वे सदा ,उठाएं ज़िन्दगी का पूरा मज़ा ; खुशियाँ लें उनके आँगन में अंगडाई ,आसमान की छूएं वो ऊंचाई; उतरे खरे कसौटी पे एक दुसरे की वो सदा ,खुदा पूरी करे उनकी हर रज़ा; भक्ति पार्क में चांदनी सी छाई ,जहाँ उन्होंने दुनिया है बसाई ;

सुहानी भोर

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थी सागर तट की सुहानी भोर ;सुनाई दे रहा था लहरों का शोर कहीं थी चांदी कहीं था सोना ,धरा था जल ने रूप सलोना ; गुनगुनाते मांझी खींचे जा रहे थे डोर ,देख कर मै हुई विभोर ; लग रहा था सूरज नभ का दिठौना,छोड़ा था पंछियों नेअपना बिछौना थिरक रहीं थीँ मछलियाँ चहुँ ओर ,ज़्युँ नाचे जंगल में मोर ;

और बरसा पानी

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रुई के फाहे से बादलजब नीले नभ पर छाये ; किसान ने अपनी पलकों पर सुंदर सपने सजाये ; जोता खेत लग कर उसने पूरी की मशक्कत ; बोये बीज धरा पर उसने कि गया वो थक ; कड़ी धूप में खड़े रहकर की उसने मेहनत; था पूरा परिश्रमी इसमें नहीं कोई शक; कहीं से आया मेघ का टुकड़ाऔर झमाझम बरसा पानी ; साकार हुआ सपना उसका उग आयी फसल धानी; हरी हरी फसल देखकर हुआ प्रफुल्लित किसान ; पड़गयी उसके सूखे अस्थिपंजर में जान ; धन्यवाद किया प्रभु का कहा "तू है कितना महान" जो तुने इस गरीब पर भी दिया ध्यान ; नैनों में उसके ख़ुशी के आंसू भर आये ; अपने सूखे होठों से फिर उसने प्रभु के गीत गाये;

उड़ान

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उड़ान; चलों उड़ चलें श्यामल बादलों के पार ; पंछियों की तरह नन्हे पंख पसार , उड़ेंगे हिम के पर्वतों पे ,नीले गगन में , खुली हवा में उड़कर पहुंचेंगे चमन में ; निहारेंगे नभ से धरा का संसार , पंछियों की तरह नन्हे पंख पसार; चुगेंगे मोतियों से दाने हरे -हरे खेतों से , झूलेंगे हम डालियों पे बड़े -बड़े पेड़ों पे , देखेंगे निकट की चमन की बहार ; पंछियों की तरह नन्हे पंख पसार , चलो उड़ चलें श्यामल बादलों के पार ; देखेंगे गगन से नीला नदिया का पानी , तैरती बत्तख उसमें और मछली रानी , आएंगे सूरज ढले ,नदिया के पार , जैसेआये पंछी शाम को थक हार ; चलो उड़ चलें श्यामल बादलों के पार ; पंछियों की तरह नन्हे पंख पसार;

एहसास

एहसास- कभी होता है एहसास की रह गयी हूँ अकेली ; फिर सोचती हूँ की इंसान आता है अकेला और जाता है तनहा ; बनते रहतेंहैं रिश्ते जिनमे छूटते रहते हैं के बनते रहते हैं नए भी ; अंत में रह जाती हैं कुछ यादें जो अलग एहसास छोड़ जातींहैं ; जीवन तो एक सफ़र है एक मौका कुदरत का, जिनमे इन रिश्तों के साथ जीना है एक सार्थक ज़िन्दगी , जो जाते समय दे एक सुकून की सही तरह जी पाए ये ज़िन्दगी ; कर पाए अपने फ़र्ज़ पूरे सभी और दे पाए जहाँ को कुछ ऐसा जिसने , दिया मेरे अपनों को एक गर्व का एहसास;

कहाँ से तू आया

कहाँ से तू आया ; कहाँ से तू आया प्राणी?कहाँ पे तू जायेगा ? इस भेद को ओ मानुष न तू जान पायेगा , हाथ में है तेरा जीवन इसे संवार ले रे बन्दे ; बंद कर दे तू अपने बुरे गोरख -धंधे ; जो न कहा तूने माना तो तू पछतायेगा ; फिर किस तरह से तू आत्म तुष्टि पायेगा ? कहाँ से तू आया प्राणी ?कहाँ पे तू जायेगा ? इस भेद को ओं मानुष न तू जान पायेगा ; हर जीव में जो देखे प्रभु के रूप को तू बन्दे । कोई असर नहीं करेंगे मोहमाया के फंदे , "गीता के सन्देश "को तू जो अपनाएगा , फिर तो इस भवसागर से पार उतर जायेगा ; कहाँ से तू आया प्राणी ?कहाँ पे तू जाएगा ? इस भेद को ओ मानुष न तू जान पायेगा; राजश्री '

भैय्या राजा

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भैय्या राजा; हज़ारों में एक है मेरा भैय्या राजा, बांटा है उसके साथ सुख -दुःख साझा; अपनी जान लुटाता है, जब भी याद करती हूँ, मुझसे मिलने आता है, राखी ,टीके की लाज वो निभाता है, है बहोत भोला वो मेरे मन को भाता है; क्रिकेट का शौक़ीन है मेरे भैय्या राजा, बांटा है उसके साथ अपना सुख -दुःख साझा; खुदा करे लम्बी उम्र हो उसकी, अपने अरमान पूरे करे वो सदा, प्यार बना रहे हम भाई -बहनों में, यही ईश्वरसे करती हूँ दुआ; बहुत ही ज़हीन है मेरा भैय्या राजा, बांटा है उसके साथ सुख -दुःख साझा;